हम लोगों की संस्कृति से सदियों खिलवाड़ की गयी, नतीजा!बहुत से गुरु के जगह गुरु घंटाल पैदा हो गए और उन्होंने आम लोगों को बरगलाया कि तुम सभी मेरे (गुरु) चरणों में पड़े रहो...और निम्न श्लोक का अर्थ अपनी सुविधा अनुसार किया कि गुरु सर्वोत्कृष्ट सर्वोपरि है, उनके चरणों में समाहित रहो...यथा... गुरुब्रम्हा गुरुविष्णु गुरुदेवो महेश्वरः । गुरु साक्षात परब्रम्हा तस्मै श्री गुरुवे नमः ।। वास्तविक अर्थ... गुरु वह है...जो खुद से खुद को परिचित करा दे! अर्थार्त... हम स्वयं ब्रह्म हैं, हम स्वयं विष्णु हैं, हम स्वयं ही महेश्वर हैं (हम सृजन करते हैं, हम पालन भी करते हैं और हम अपने सृजन पर नियंत्रण भी रखते हैं) तो सही अर्थ है, कि गुरु वह है जो हम से हम को मिला दे lol अथ...संत कबीर ने अपने अंदाज में लोगों को सचेत किया...सादर नमन है, इस मार्ग दर्शक को...प्रणाम [07/12, 21:08] R K Sinha: जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधा अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़त ।। ...